सहकारी सियासत में सरकार को झटका

Chhattisgarh, Government, 11 IAS officers, Major reshuffle in charge,

सोसायटियों को भंग करने के आदेश पर हाईकोर्ट का स्टे
8 जिलों की सोसायटियां गई थी रोक की याचिका लेकर

रायपुर(realtimes) छत्तीसगढ़ ()में सहकारी सोसायटियों ()को भंग ()करने की राज्य सरकार ()की कवायद को हाईकोर्ट से स्टे ()का झटका लगा है। राज्य सरकार की कृषि साख सहकारी सोसायटी पुनर्गठन योजना 2019 के बिंदु क्रमांक 8 पर हाईकोर्ट की डबल बैंच ने रोक लगा दी है। योजना में इस बिंदु के तहत सोसाटियों की निर्वाचत इकाईयों को भंग कर दिया गया था। हाईकोर्ट में इस संबंध में राज्य को 18 जिलों की सोसायटी के चुने हुए प्रतिनिधियों ने याचिका प्रस्तुत की थी।

Chhattisgarh, Co-operative societies, Breach, State government, Stay from high court,

ये कहना है याचिकर्ता का

भाजपा के सहकारिता प्रकोष्ठ से जुड़े नेता तथा पैक्स कुरुद निर्वाचित अध्यक्ष प्रवीण चंद्रकार उन लोगों में शामिल है जिन्होंने सोसायटी भंग करने के फैसलें को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने कहा है कि पुनर्गठन योजना 2019 के बिंदु क्रमांक 8 पर स्टे मिला है। आदेश की प्रति शनिवार तक मिलेगी। उन्होंने कहा है सोसाटियों का निर्वाचन पांच साल के लिए हुआ है,लेकिन कार्यकाल पूरा होने के तीन साल पहले ही हटाया जा रहा है। यह हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन है। हम लोग पुनर्गठन प्रक्रिया के खिलाफ नहीं है, लेकिन जिस प्रकार चुने हुए लोगों को हटाया जा रहा है हम उसका विरोध कर रहे हैं। पुनर्गठन की मांग नीचे से आनी थी, लेकिन मांग आए बिना पुनर्गठन किया जा रहा है।

ये सरकार की करारी हार है-चंद्राकर

प्रवीन चंद्राकर का कहना है इस मामले में हार्इकोर्ट का जो फैसला आया है उससे साफ है कि सरकार की करारी हार हुई है। सरकार यह कदम पूरी तरह से अलोकतांत्रिक था। ऐसा लगता है कि यह सरकार अभी तक आपातकाल की मनोवृत्ति से मुक्त नहीं हो पाई है।

राज्य गठन के बाद भी भंग नहीं हुई थी संस्थाएं

श्री चंद्राकर ने कहा है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के समय 2000 में अविभाजित मप्र के समय से निर्वाचित इकाइयों, जैसे मार्कफेड, दुग्ध संघ को भंग नही किया गया था। उनका कार्यकाल पूरा होने दिया गया था। लेकिन अब ऐसा क्या हो गया है कि राज्य में सरकार बदलने व कांग्रेस सरकार बनने के बाद निर्वाचित इकाईयों को भंग किया जा रहा है।

ये है सहकारी सियासत के दांवपेंच

राज्य सरकार ने प्रदेश में सहकारिता की रीढ़ मानी जाने वाली 1333 सोसायटियों की निर्वाचित इकाइयों का पुनगर्ठन करने के साथ ही इन सभी संस्थाओं को भंग करना शुरु कर दिया था। सरकार के इस प्रयास का राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा व सहकारिता क्षेत्र में उससे जुड़े लोग कर रहे थे। जैसी ही पुनर्गठन की प्रक्रिया के लिए राजपत्र में अधिसूचना प्रकाशित की गई,ये मामला हाईकोर्ट में गया.प्रारंभिक सुनवाई के बाद शुक्रवार को अदालत ने स्टे आदेश जारी कर दिया।

ये है सहकारिता का सियासी दांव

प्रदेश के सहकारी सिस्टम का आधार मानी जाने वाली सोसायटियों में पिछले 15 साल के भाजपा शासनकाल के दौरान अधिकांश पर भाजपा समर्थितों का कब्जा है। राज्य में दिसंबर 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद यह कोशिश शुरु की गई कि इन सोसायटियों से भाजपा के लोगों को हटााया जाए। जिन 1333 निर्वाचित इकाईयों को भंग करने की कवायद शुरु हुई है उनका कार्यकाल करीब तीन साल बाकी है। लेकिन सरकार ने यह समितियों के क्षेत्राधिकार को बदलने, व्यवस्थित करने के नाम पर समितियों को भंग कर उनके स्थान पर प्राधिकृत अधिकारियों को नियुक्त करना शुरु कर दिया है।

भाजपा ने भी सहकारी सिस्टम पर ऐसे ही कसा था शिकंजा

सहकारिता के क्षेत्र में कांग्रेस अभी जो दांवपेंच खेल रही है इसी प्रकार या इससे भी आगे बढ़कर भाजपा ने अपने शासनकाल में इसी तरह की कारगुजारी करते हुए सिस्टम पर कब्जा जमाया था। भाजपा शासनकाल में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक,राजनांदगांव, दुर्ग सहित कुछ अन्य बैंकों में व्यापक अनियमिताएं हुई। कांग्रेस सरकार बनने के बाद इस बैंक का बोर्ड भंग कर संचालक मंड़ल हटाया गया। इसी क्रम में दुर्ग जिला केंद्रीय सहकारी बैंक के संचालक मंड़ल व बैंक बोर्ड को भंग करने का नोटिस जारी हो चुका है,लेकिन सहकारिता पंजीयक इस मामले को विधिक प्रक्रिया बताते हुए लटकाए हुए हैं। माना जा रहा है कि दुर्ग बैंक संचालक मंड़ल को भी हाल-फिलहाल में भंग किया जाएगा। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के कार्यकाल में सहकारी क्षेत्र की सबसे बड़ी संस्था मार्कफेड पूरी तरह विवादों तथा वित्तीय अनियमितताओं में डूबी रही। इस संस्था की कारगुजारी की वजह से 15 साल में एक हजार करोड़ रुपए से अधिक का नुकसान हुआ, भाजपा सरकार ने खामोशी से इस नुकसान की भरपाई सरकारी खजाने से करवाई, लेकिन कभी यह जांच नहीं करवाई गई कि केवल धान खरीदने की प्रक्रिया से ही इतना बड़ा घाटा कैसे, ये कहां का अर्थशास्त्र है।

इसी क्रम में बिलासपुर जिला सहकारी केंद्रीय बैक में करोड़ो रुपए की वित्तीय अनियमितता के साथ नियुक्तियों से लेकर किसानों को कर्ज देने तक के घोटाले हुए हैं। लेकिन इन मामलों में प्रभावी कार्रवाई का अभाव रहा। माना जा रहा है कि सहकारी क्षेत्र में ताजा झटके के बाद कांग्रेस सरकार सहकारी क्षेत्र में एक बार फिर पलटवार के साथ सामने आएगी। सबसे बड़ा मसला राज्य के पूरे सहकारी क्षेत्र में कांग्रेस समर्थितों को काबिज करवाने का है।

One Comment on “सहकारी सियासत में सरकार को झटका”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *